कल दिखाने वाली घड़ी
Edition language Hindi
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नाम लो, कल देखो। फिर उसकी क़ीमत चुकाओ।
बनारस के केदार घाट के पीछे की तंग गली में चुप्पा घड़ीसाज़ केशव अपने गुज़रे दादा की दुकान और इकतालीस घड़ियाँ विरासत में पाता है। चालीस रुक जाती हैं। पीतल वाली नहीं रुकती। वह ठीक एक दिन आगे चलती है, और चाबी पकड़कर किसी का नाम लो, तो पेंडुलम में वह आदमी कल दिखता है। केशव पड़ोसियों की छोटी-छोटी मुश्किलें सुलझाने लगता है। फिर उसे पता चलता है कि घड़ी हिसाब रख रही है। और एक शाम, जब वह सबसे प्यारा नाम लेता है, पेंडुलम में कुछ भी नहीं दिखता।
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