हवेली की नौवीं चाबी
Edition language Hindi
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नौ चाबियाँ। एक ग़ायब। सुबह तक का वक़्त।
मेहर की शादी से एक रात पहले, जयपुर के पुराने शहर की केसर हवेली में गेंदे के फूल हैं, ढोलक है, गीली मेहंदी है। फिर दादी के पीतल के गुच्छे से नौवीं चाबी ग़ायब मिलती है — उस नीले दरवाज़े की, जिसे तीस साल से किसी ने नहीं खोला। कुछ घंटे बाद बंद संदूक से दुल्हन का ज़ेवर भी ग़ायब। दादी पुलिस नहीं बुलाने देतीं, ग्यारह बजे बारात वाले आएँगे। और ध्यान बस उसी लड़की का है, जिससे सब कहते हैं — जा, सो जा।
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